अथ श्रीचन्द्रप्रभजिनस्तुतिः

(स्वाध्याय – शब्दार्थ एवं भावार्थ)

चन्द्रप्रभं चन्द्रमरीचिगौरं,

चन्द्रं द्वितीयं जगतीव कान्तम्‌ ।

वन्दे भिवन्द्यं महतामृषीन्द्रं,

जिनं जितस्वान्तकषायबन्धम्‌ ॥१॥

अन्वयः – चन्द्रमरीचिगौरं, जगति द्वितीयं कान्तं चन्द्रं इव, महतां अभिवन्द्यं, ऋषीन्द्रं, जितस्वान्तकषायबन्धं, जिनं चन्द्रप्रभं वन्दे ।

शब्दार्थ – चन्द्रमरीचिगौरं – चंद्रमा की किरणों के समान गौरवर्ण है जिनका, द्वितीयं – दूसरे, जगति – लोक में, इव – समान, कान्तं – दीप्तिमान, अभिवन्द्यं – सब ओर से वंदनीय, महतां – महापुरुषों के द्वारा, ऋषिन्द्रं – गणधरों के नायक, जिनं – कर्मविजेता, जितस्वान्तकषायबन्धम्‌ – मन के साथ हुए कषायों के बंध को जित लिया है जिन्होंने ।

भावार्थ :- चंद्रमा के समान सफेद वर्णवाले, जगत् में मानों दूसरे चंद्रमा के समान, अत्यंत कांतिमान् , इन्द्रादि महापुरुषों के द्वारा वंदनीय, गणधरों के भी स्वामी, सभी प्रकार के पापकर्म या दोषों को जित लेने से जिन तथा कषायों के विजेता श्रीमान् चन्द्रप्रभ भगवान् को वन्दन करता हूँ ।

यस्याङ्-लक्ष्मी-परिवेश-भिन्नं,

तमस्तमोरेरिव रश्मिभिन्नम्‌ ।

ननाश बाह्यं बहु मानसं च,

ध्यानप्रदीपातिशयेन भिन्नम्‌ ॥२॥

अन्वयः – तमोरेः रश्मिभिन्नं इव यस्य अंगलक्ष्मीपरिवेशभिन्नं बाह्यं ध्यानप्रदीपातिशयेन भिन्नं बहु मानसं च तमः ननाश ।

शब्दार्थ – यस्य- जिनके, अंगलक्ष्मीपरिवेशभिन्नं – देह की परमकान्ति के मंडल द्वारा भिन्न, तमः – अन्धकार, तमोरेः – अन्धकार का शत्रु अर्थात् सूर्य की, रश्मिभिन्नं – किरणों से भिन्न, इव – समान, ननाश – नष्ट कर दिया था, बाह्यं – बाहर का, बहु – बहुत, मानसं – मानसिक, ध्यानप्रदीपातिशयेन- ध्यानरूपी दीपक के अतिशय के द्वारा ।

भावार्थ – सूर्य की किरणों के द्वारा नष्ट किये जानेवाले अंधकार के समान जिनके परम कान्तिमान शरीर के दीप्तिमण्डल के द्वारा बाह्य अन्धकार विदीर्ण होकर नष्ट हुआ था तथा ध्यानरूपी दीपक के अतिशय के द्वारा मानस में छाया हुआ अज्ञानरूपी सघन अन्धकार छिन्न भिन्न होकर नष्ट हुआ था ।

स्वपक्ष-सौस्थित्य-मदावलिप्ता,

वाक्-सिंहनादैर्विमदा बभूवुः ।

प्रवादिनो यस्य मदार्द्रगण्डा,

गजा यथा केसरिणो निनादैः ॥३॥

अन्वयः – केसरिणः निनादैः मदार्द्रगण्डाः गजाः यथा (विमदाः भवन्ति तथा) यस्य वाक्-सिंहनादैः स्वपक्षसौस्थित्यमदावलिप्ताः प्रवादिनः विमदाः बभूवुः ।

शब्दार्थ –  स्वपक्षसौस्थित्यमदावलिप्ता – अपने पक्ष की सुस्थिति  के अहंकार से सने हुए, वाक्सिंहनादैः – वचनरूपी सिंह की गर्जना द्वारा, विमदाः – मदरहित, बभूवुः – हो गए थे, प्रवादिनः – अन्यमती, यस्य – जिनकी, मदार्द्रगण्डा – मदमत्त कपोलवाले, गजाः – हाथी, यथा – जिसप्रकार, केसरिणः – सिंह की निनादैः – गर्जना द्वारा ।

भावार्थ – जिसप्रकार सिंहनाद के द्वारा मद से गीले कपोलवाले हाथी मदरहित हो जाते हैं उसीप्रकार जिनके वचनरूपी सिंहनाद के द्वारा अपने पक्ष या मत की सुस्थिति के अहंकार से लिप्त प्रवादी (अन्यमत के संस्थापक या प्रचारक) मदरहित हो गए थे ।

यः सर्वलोके परमेष्ठितायाः,

पदं बभूवाद्भुतकर्मतेजाः ।

अनन्त-धामाक्षर-विश्वचक्षुः,

समन्त-दुःख-क्षय-शासनश्च ॥४॥

अन्वयः – यः अद्भुतकर्मतेजाः अनन्तधामाक्षरविश्वचक्षुः समन्तदुःखक्षयशासनः च सर्वलोके परमेष्ठितायाः पदं बभूव ।

शब्दार्थ – यः – जो, सर्वलोके- तीनों लोक में, परमेष्ठितायाः – परमेष्ठिपने के, पदं – स्थान, बभूव – हुए थे, अद्भुतकर्मतेजाः – अचिन्त्य कार्यों में तेजसंयुक्त, अनन्तधामाक्षरविश्वचक्षुः – अनंत, अविनश्वर, लोकालोक के चक्षुस्वरूपी, समन्तदुःखक्षयशासनः च – सभी प्रकार के दुःखों का क्षय करनेवाला शासन या मत है जिनका ऐसे वे ।

भावार्थ – हितोपदेशरूपी अचिन्त्य कार्यों में जो तेजस्वी थे, जो अनंत-अविनश्वर और लोकालोक के चक्षुस्वरूप थे अर्थात् जो केवलज्ञान से संपन्न थे, जिनका शासन प्राणिगणों के सभी दुःखों का क्षय अर्थात् नाश करनेवाला था ऐसे जो परमेष्ठिपने को प्राप्त हुए थे

स चन्द्रमा भव्यकुमुद्वतीनां

विपन्न-दोषाभ्र-कलङ्क-लेपः ।

व्याकोश-वाङ्-न्याय-मयूख-मालः

पूयात् पवित्रो भगवान् ! मनो मे ॥५॥

अन्वयः – भव्यकुमुद्वतीनां चंद्रमा विपन्नदोषाभ्रकलङ्कलेपः व्याकोशवाङ्न्यायमयूखमालः पवित्रः भगवान् मे मनः पूयात् ।

शब्दार्थ – सः – वह, भव्यकुमुद्वतीनां – भव्यजीवरूपी कुमुदिनियों (कमलिनियों) के, विपन्नदोषाभ्रकलङ्कलेपः – दोषरूपी मेघ और कलंक के लेप को नष्ट कर दिया है जिन्होंने, व्याकोशवाङ्न्यायमयूखमालः – विकसित ऐसी दिव्यध्वनिरूपी किरणों की माला, पूयात् – पवित्र करें, मनो – चित्त, मे – मेरे

भावार्थ – जो भव्य जीवरूपी कमलिनियों को विकसित करने के लिए चंद्रमा के समान है, सभी प्रकार के पाप या दोषरूपी बादल और कलंक के लेप को जिन्होंने नष्ट कर दिया है, जिनकी दिव्यध्वनिरूपी किरणों की माला भी विकसित अर्थात् सुव्यक्त या स्पष्ट है, जो पवित्र अर्थात् निर्विकार है, ऐसे वे भगवान् (अष्टम तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र) मेरे चित्त को विशुद्ध करें ।

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