
नेमी नगर जैन कॉलोनी,इंदौर।
आचार्य श्री ने जीवन की वास्तविकता और संसार की नश्वरता को समझाते हुए कहा कि “वक्त का हर दौर बदल जाता है, यहाँ हँसता हुआ चेहरा भी ढल जाता है।” संसार में परिवर्तन ही एकमात्र स्थायी सत्य है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता—आज की परिस्थितियाँ कल बदल सकती हैं और आज जो व्यक्ति सुख, सौंदर्य, सम्मान या वैभव के शिखर पर है, उसका समय भी बदल सकता है।

गुरुदेव ने मनुष्य को अहंकार से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि अपनी शान, सुंदरता, पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति पर कभी गुरुर नहीं करना चाहिए। जिस सुंदरता पर आज मनुष्य को अभिमान है, वह भी समय के साथ ढल जाती है और जिस वैभव को वह अपना समझता है, वह भी एक दिन पीछे छूट जाता है। संसार में किसी का भी एक ही स्थान या अवस्था सदा के लिए नहीं रहती।
उन्होंने कहा कि यह संसार परिवर्तनशील है, यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं है। जीव राग और द्वेष से बंधकर बार-बार संसार में परिभ्रमण करता रहता है। मोह, आसक्ति और अहंकार मनुष्य को वास्तविक आत्मस्वरूप से दूर ले जाते हैं और उसे संसार के चक्र में बांधे रखते हैं।

गुरुदेव ने जीवन की क्षणभंगुरता को एक गहरी सीख के रूप में रखते हुए कहा कि मनुष्य संसार में कितने ही लंबे समय तक रहने की उम्मीद क्यों न करे, एक दिन सांसों का यह सिलसिला भी थम जाता है। जिस शरीर, रिश्तों, सुख-सुविधाओं और संसारिक उपलब्धियों को मनुष्य अपना मानता है, उन्हें एक दिन यहीं छोड़कर जाना पड़ता है।
इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल संसारिक सुखों को प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, धर्म, संयम और सदाचार के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए। जब मनुष्य संसार की नश्वरता को समझता है, तब उसके भीतर से अहंकार और मोह कम होने लगते हैं और वह शाश्वत आत्मा की ओर बढ़ने का प्रयास करता है।

गुरुदेव का यह संदेश प्रत्येक व्यक्ति को स्मरण कराता है कि समय बदलने में देर नहीं लगती, शरीर ढलने में देर नहीं लगती और सांसों का भरोसा नहीं है—इसलिए जब तक जीवन है, तब तक धर्म और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलना ही सबसे सार्थक प्रयास है। (Jinagam)
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