जिनागम  |  धर्मसार

बदलते चेहरे के बीच आत्मा का निखार ही सच्ची पहचान – आचार्य श्री सुनीलसागर जी

नेमी नगर जैन कॉलोनी,इंदौर।
फैशन हर दिन बदलता है, समय के साथ चेहरे की सुंदरता भी बदल जाती है और शरीर भी एक दिन परिवर्तन के नियम के अधीन हो जाता है। जन्म-मरण के इस संसार में न जाने कितनी बार हमारे चेहरे बदले, शरीर बदले, तन बदला और मन की अवस्थाएँ भी बदलती रहीं। लेकिन इन सभी परिवर्तनों के बीच यदि कुछ संवारने योग्य है, तो वह है अपनी आत्मा और अपने भाव।


मानव जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह केवल संसार में सुख पाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को बदलने और निखारने का अवसर है। इसी जीवन में एक साधारण संसारी जीव अपने पुरुषार्थ से सिद्धत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसलिए बाहरी रूप-सज्जा से अधिक आवश्यक है कि हम अपने भीतर के रूप को सुंदर बनाएं।
आज मनुष्य बाहरी दुनिया में अनेक मुखौटे पहनकर जी रहा है। चेहरे पर मुस्कान है, शब्दों में मिठास है, लेकिन मन के भीतर सच्चाई कितनी है—यह सबसे बड़ा प्रश्न है। मन के खोटे भाव, स्वार्थ, छल और कपट बाहरी सुंदरता को भी फीका कर देते हैं।


इसलिए वास्तविक निखार महंगे कपड़ों, बदलते फैशन या सुंदर चेहरे में नहीं, बल्कि निर्मल भावों, सच्चे मन और आत्मिक जागृति में है। जो अपने भीतर को संवार लेता है, वही वास्तव में सुंदर बनता है और वही अपने मानव जीवन को सार्थक दिशा दे सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जिनागम | धर्मसार