संक्षिप्त तीर्थ क्षेत्र परिचय

ईसा की पंद्रहवीं सदी में दक्षिण दिशा वासी गौड़ विप्र वर्ण दिगम्बर जैन धर्माबलम्बी अनेक यंत्र मन्त्र तंत्र के ज्ञाता स्वनाम धन्य पूज्य 105 बाबा ऋषभ दास जी का यकायक विहार करते हुए इस भूमि पर सुभागमन हुआ |

यह बाबा जी मात्र एक चद्दर व लंगोटी कीे परिग्रह के धारक थे |

यहां की उत्तम मनोहारी भूमि को देखकर बाबा जी एक मन्दिर बनवाने का विचार लोगों के सामने रखा उस समय मरसलगंज धन्य धान्य से परिपूर्ण था साथ ही व्यापार का केन्द्र भी था एवं जैन बंधुओं के घर थे जब मन्दिर बनना प्रारंभ हुआ तो उस समय कोई चुगलखोर राजा के पास गया और बोला कि राजन ! कोई जैन महात्मा मरसलगंज की जमीन अपने कब्जे में कर रहे हैं जैसे ही राजा ने आग बबूला हो गया और अपने मंत्रियों को तुरंत आदेश दिया कि लाग तुरंत बन्द करवा दी जाये | मंत्रियों ने ऐसा ही किया और काम बंद हो गया तो लोग चिंतित हुए बाबा जी ने कहा चिंता मत करो सब काम होगा जब रात्रि में राजा अपने किले में लेटा हुआ था उस समय उसे प्रतीत हुआ की मेरा पूरा किला घूम रहा है और मुझे कोई पीट रहा है  दिखाई नहीं दे रहा | वह परेशान हो गया तो मंत्रियों ने कहा राजा साहब ! कल जो आपने मरसलगंज वाले बाबा का काम बंद  करवाया दिया था इस लिए ये वाधा उत्पन्न हुई है | राजा की समझ में आ गयी और नंगे पैर दण्डवत करता हुआ बाबा जी के पास मरसलगंज में आया और बाबा जी से क्षमा मांगी और और अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि जितना रुपया लगे सब राज खजाने से आये और मंदिर बनाना चाहिए |

बाबा जी ने मंदिर बनवाने के लिए चंदा इकट्ठा नहीं किया | कहा जाता है कि जब शाम को मजदूर एवम अन्य सामान के लिए जितने रुपयों की आवश्यकता होती थी वह बाबा जी अपनी चटाई के नीचे से देते थे | यह देखकर लोग आश्चर्य करते की जितने रुपये की जरूरत होती है उतने रुपये ही निकलते हैं इस प्रकार बाबा जी ने विशाल शिखर युक्त जिनालय का निर्वाण कराया और कहीं दूर देश से लाकर एक मूर्ति श्री 1008 देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव की पद्मासन प्रतिमा को मन्दिर जी में प्रतिष्ठित है | मन्दिर जी मे प्रतिष्ठा स्वयं बाबा जी ने ही करवाई  बताया जाता है कि इस मेले में इतनी भीड़ हुई कि कुँए का पानी खत्म हो गया लोग हाहाकार करने लगे तब बाबा जी ने कुछ कंकड़ पढ़कर कुँए में डाले तो कुँए का पानी इतना हो गया कि आज तक खत्म नहीं हुआ है और ज्योनार के समय जब आटा खत्म हो गया तो बाबा जी ने कहा बोरी मत झाड़ो और और एक चद्दर ढकवा दी इसके नीचे से जितने आटे की आवश्यकता हो उतना ले लो और खर्च करो |

जब घी खत्म हो गया तो कुँए के पानी से ही घी का सब काम चलाया गया था | बाबा जी का तपोबल चरित्र बल विद्याबल इतना विशिष्ट हो था आस पास का जैन अजैन समाज उनसे प्रभावित था लोग बाबा ऋषभदास और भगवान ऋषभदेव अनन्य भक्त बन गये थे दूर दूर से यात्री आते और उनकी शुद्ध ह्रदय से की गई कामनाओं की पूर्ति होती थी तभी से ये क्षेत्र दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र ऋषभ नगर मरसलगंज के नाम से प्रसिद्ध हो गया यहां पर वि•स• 2020 माघ शुक्ला5 वसन्त पँचमी को विशाल पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हुई बहार नए मन्दिर जी मे भगवान आदिनाथ जी की 9 फुट ऊंची श्वेत वर्ण विशालकाय पदमासन जी जो की शेठ चांदमल जी पंड्या गोहाटी (आसाम) वालों ने प्रतिष्टित कराई इसमें भारत भर के श्रेष्ठी वर्ग एवं पंडित वर्ग पधारे थे तथा प्रतिमा को सूर्य मन्त्र आचार्य विमल सागर जी ने दिया |

मकराना पत्थर निर्मित ऐसी प्रतिमा और कहीं भी नहीं है |

इस क्षेत्र पर अनेक महान सन्तो ने अपनी चरण रज से शुद्ध किया है आचार्य आचार्य शन्ति सागर जी महाराज , (दक्षिण ) अट्ठारह भाषा भाषी आचार्य महावीरकीर्ति जी महाराज, सन्मार्ग दिवाकर आचार्य विमल सागर जी महाराज आचार्य कल्याण सागर जी महाराज बाल योगी अमित सागर जी महाराज बाल योगी योगीन्द्र सागर जी महाराज आचार्य सौभाग्य सागर जी महाराज एवम अन्य साधु ससंघ इस क्षेत्र में पधार चुके हैं |

यहाँ पर प्रति वर्ष दो बार चैत्र सुदी 9वीं (श्री ऋषभदेव जन्म जयन्ती) एवम माघ वदी चौदस (श्री ऋषभनिर्माण उत्सव)मेले होते हैं !यह क्षेत्र कस्बा फरिहा से 1कि.मी दूर है यहां जैन समाज के 100 के लगभग घर हैं यह क्षेत्र आगरा से 66 कि.मी फ़िरोज़ाबाद से 22 कि.मी मैनपुरी से 67 कि.मी और एटा से 55 कि.मी है!

समुचित व्यवस्थाएं

श्री ऋषभ नगर मरसलगंज अतिशय तीर्थ क्षेत्र जिला फ़िरोज़ाबाद से हर 20 मिनट पर बस सेवा उपलब्ध है यह बस कस्बा फरिहा तक आती है फिर कस्बा फरिहा से मन्दिर के लिए टैक्सी से भी जा सकते हैं!

यात्रियों के लिए आवास  और भोजन व्यवस्था

यात्रियों के लिये आवास हेतु सर्व सुविधा युक्त डीलक्स रूम एवं साधारण रूम उपलब्ध हैं क्षेत्र पर यात्रियों के लिए विशाल भोजनशाला उपलब्ध है जिसमें सैकड़ों यात्रियों के लिए शुद्ध भोजन की समुचित व्यवस्था उपलब्ध है !

प्रिन्स जैन फरिहा

📱 7983795051

    8923567279

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