
मेरे गुरु ‘अंतर्मना’ जैसा कोई नहीं: 108 उपाध्याय श्री पीयूष सागर जी महाराज
मेरे गुरु ‘अंतर्मना’ जैसा कोई नहीं: 108 उपाध्याय श्री पीयूष सागर जी महाराज
दुनिया में गुरु हजारों है ‘अंतर्मना’ जैसा कोई नहीं: 108 उपाध्याय श्री पीयूष सागर जी
मुझे पिछले दिनों अहिच्छत्र पार्श्वनाथ जैन मंदिर और ‘अंतर्मना’ 108 आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज एवं उनके परम शिष्य उपाध्याय पीयूष सागर जी महाराज के दर्शन का सौभाग्य मिला और साथ ही साथ उपाध्याय पीयूष सागर जी महाराज का साक्षात्कार लेने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ | साक्षात्कार के कुछ अंश :

- वास्तविक ज्ञान क्या है?
जो दिख रहा है, वह छूटने वाला है। आखिर इस शरीर के भीतर ऐसा क्या है जो देख रहा है, लेकिन स्वयं दिख नहीं रहा? व्यक्ति सब कुछ देख रहा है, फिर भी कुछ नहीं दिख रहा। ऐसा क्या है? कौन सी चीज़ है जो आ गई, चली गई, या फिर निकल गई? आखिर सत्य क्या है? - आखिर सत्य क्या है?
संसार में सुख कहाँ है? क्या किसी ने परमात्मा को देखा है? नहीं। तो फिर मंदिर में कौन बैठा है? अगर वह परमात्मा है, तो कहाँ है? यदि वह हमारे जैसा है, तो क्या हम उससे मिल सकते हैं? क्या हम उसके समान बन सकते हैं? मुझे भी उसके जैसा बनना है। - क्या हम उनके जैसा बन सकते हैं?
गुरुदेव का कथन है—
“तुम बीज हो, वृक्ष बन सकते हो।
तुम बूंद हो, सागर बन सकते हो।
तुम आत्मा हो, परमात्मा बन सकते हो।”
मेरे कदम भी ईश्वर के मार्ग पर चल पड़े हैं। - जीवन में गुरु की क्या महिमा है?
जो कुछ भी मैं हूँ, वह गुरुदेव की कृपा से ही हूँ। याद रखो, मैं बुझा हुआ था, उन्होंने मुझे जला दिया। एक जलता हुआ दीपक, लाखों बुझ चुके दीपकों को रोशन कर सकता है। परंतु लाखों बुझ चुके दीपक मिलकर भी एक दीपक को नहीं जला सकते।
हम किसी संस्थान में नहीं गए, हमारे गुरुदेव भी नहीं गए, फिर भी सारा ज्ञान हमारे भीतर ही उपलब्ध है। जितने भी बड़े ग्रंथ रचे गए, क्या वे किसी संस्थान में जाकर सीखे गए? नहीं! तो फिर वह ज्ञान कहाँ से आया? कहीं न कहीं से तो आया होगा! वह दिव्य शक्तियों के माध्यम से प्राप्त हुआ। हर आत्मा में “मति” और “श्रुत” नाम का ज्ञान उपलब्ध है। इस ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को थोड़ा पुरुषार्थ करना आवश्यक है। - जैन धर्म का क्या मत हैं?
जैन धर्म कहता है कि जब कर्मों का क्षय होगा, तब ज्ञान प्रकट होगा। इसी कारण साधना और आराधना की जाती है। सभी धर्मों में व्रतों की महिमा का गुणगान किया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि हमारा ज्ञान सम्यक् ज्ञान में परिवर्तित हो जाए और हमें ज्ञान की प्राप्ति हो। इस ज्ञान के अतिरिक्त संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है।
6 अंतर्मना के संदर्भ में बताएं?
अंतर्मना के विषय में शब्दों में कुछ भी कहना संभव नहीं, क्योंकि केवल अंतर्मना ही स्वयं को प्रकट कर सकते हैं। जैसे आप यह नहीं बता सकते कि शक्कर कितनी मीठी है, वैसे ही अंतर्मना को भी शब्दों में नहीं समझाया जा सकता।
जैन धर्म में अनेक साधक हैं, परंतु अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज ने पिछले 36 वर्षों में 5000 से अधिक व्रत-उपवास किए हैं। पुराने ग्रंथों में महा-उपवासी साधुओं का वर्णन मिलता है, जो पूर्ण रूप से अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करते थे। ऐसे ही एक आत्मसंयमी व्यक्ति अंतर्मना स्वयं हैं।
उपवास करने का उद्देश्य इंद्रियों और आंतरिक इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करना होता है। केवल बाहरी इंद्रियों को रोकना पर्याप्त नहीं, बल्कि भीतर से भी आसक्ति मुक्त होना आवश्यक है। जैन दर्शन कहता है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए केवल बाहरी संयम नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता भी आवश्यक है। - गुरुदेव अंतर्मना का कहना है—
“जिसे तुम चाहो, उससे कुछ मत चाहो।”
यह संपूर्ण खेल चाहत का है। हर व्यक्ति कुछ न कुछ चाहता है, परंतु कर नहीं पाता। अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज ने लगातार 557 दिनों तक 496 उपवास और 61 प्राण किए। उनकी इस तपस्या को गिनीज बुक, इंडिया बुक, और एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान मिला है। यह व्रत जैन धर्म में अत्यंत कठिन माना जाता है और इसे भगवान महावीर के बाद बहुत कम संतों ने किया है। उन्होंने यह संदेश दिया कि संसार में खाने से मरने वालों की संख्या अधिक है, लेकिन न खाने से मरने वालों की संख्या बहुत कम। मेरे गुरु ‘अंतर्मना’ जैसा कोई नहीं| - तीर्थों की सुरक्षा को लेकर जैन धर्म का क्या मत है?
यदि हमारे तीर्थ सुरक्षित रहेंगे, तो हमारे संस्कार और संस्कृति भी सुरक्षित रहेंगे। तीर्थ स्थलों को देखकर ही हमारी सनातन संस्कृति की प्राचीनता का पता चलता है। यदि ये तीर्थ और मूर्तियाँ न होतीं, तो हमें कैसे ज्ञात होता कि हमारा धर्म कितना प्राचीन है?
आज की युवा पीढ़ी बहुत अनुशासित है, लेकिन मोबाइल और आधुनिक तकनीक के प्रभाव से कुछ नकारात्मक परिवर्तन भी आए हैं।
गुरुदेव कहते हैं—
“जिसका मोबाइल होता है, उसका कोई नहीं होता।”
हमें आधुनिकता के साथ-साथ वास्तविकता के धरातल पर भी खड़ा रहना चाहिए। जैन समाज की संख्या कम होने के कारण कई बार नेतृत्व की कमी दिखती है, जिससे हमारी समस्याएँ सत्ताधारी लोगों तक नहीं पहुँच पातीं। इसलिए युवाओं को इस दिशा में भी आगे बढ़ना होगा।
गुरु-शिष्य परंपरा क्यों महत्वपूर्ण है? और गुरु का इतना महत्व क्यों है?
गुरु हमें केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि हमारे पाप कर्मों को नष्ट करने की क्षमता भी केवल उनके पास होती है। अन्य कोई भी व्यक्ति हमें हमारे पापों से मुक्त नहीं करा सकता। - अपने भविष्य के कार्यक्रमों के संदर्भ में कुछ बताएं?
हम जल्द ही बद्रीनाथ यात्रा पर जा रहे हैं। आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज जैन धर्म के एक महान संत हैं, उनके द्वारा संचालित ‘अहिंसा संस्कार पदयात्रा’ एक अनूठी पहल है, अहिंसा संस्कार पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य समाज में अहिंसा और नैतिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना है। आचार्य श्री ने यह यात्रा तब प्रारंभ की जब उन्होंने देखा कि आधुनिक समाज में हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक पतन बढ़ता जा रहा है। इस यात्रा का संदेश स्पष्ट है— “अहिंसा परमो धर्मः”। यह यात्रा विभिन्न गांवों, कस्बों और शहरों से होकर गुजरती है, जहाँ लोगों को अहिंसा और नैतिकता के मूल सिद्धांतों का पालन करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज अब तक 1.5 लाख किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं। 9 अप्रैल को मुक्तेश्वर धाम पहुँचेंगे और 10 अप्रैल को ‘अंतर्मना’ का 36वां दीक्षांत समारोह वहीं आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर जीवन दर्शन सम्मेलन भी आयोजित किया जाएगा। यह यात्रा न केवल जैन समुदाय के लिए बल्कि संपूर्ण समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत है।
अंत में मैं कहना चाहूंगा परमात्मा दिखाई नहीं देते, जैसे विश्वास और भरोसा भी दिखाई नहीं देते। लेकिन इनके बिना यह संसार चल भी नहीं सकता।
थोड़ा झुकना सीखों, थोड़ा सहना सीखों जहां ये बातें होंगी वहा जीवन अच्छा हो जायेगा जैसे मोबाइल पर बात करने पर गर्दन थोड़ा झुक जाती है हकीकत में रिश्तों में थोड़ा झुक जाओ तो जीवन तुम्हारा अच्छा होगा |
याद रखना, आशीर्वाद, भरोसा और विश्वास: यह कभी दिखाई नहीं देते जैसे परमात्मा भी कभी दिखाई नहीं देते पर वो हमेशा आपके साथ होते हैं| अंतिका जैन