बापूजी का अतुलनीय स्थान : लेखक :- संजय बज
बापूजी का अतुलनीय स्थान : लेखक :- संजय बज

जीवन में माता-पिता का स्थान शास्त्रों और समाज दोनों में सर्वोच्च माना गया है। कहा भी गया है—
“मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।”
अर्थात माता-पिता देवतुल्य होते हैं। सामान्य परिस्थितियों में भी उनका महत्व कम नहीं होता, किंतु कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब उनका अस्तित्व स्वयं आशीर्वाद बन जाता है।
हमारे बापूजी—अर्थात हमारे पिता श्री—ऐसे ही आशीर्वाद का सजीव स्वरूप हैं। आगामी 20 जनवरी 2026 को वे अपने जीवन के 94 वर्ष पूर्ण करने जा रहे हैं। इतनी दीर्घ आयु के बावजूद वे आज भी आश्चर्यजनक रूप से स्वस्थ हैं। न कोई गंभीर बीमारी, न शरीर पर रोगों के चिह्न। यह उनके संयमित जीवन, सादा आहार, शुद्ध दिनचर्या और संस्कारों की शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
आज का दिन हमारे जीवन के उन विशेष क्षणों में से एक रहा, जिसे स्मृति में सहेजकर रखना चाहिए। हम पट्टाचार्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के दर्शन हेतु घर से लगभग 9 किलोमीटर दूर पहुँचे। इस पुण्य यात्रा में बापूजी भी हमारे साथ थे। जैसे ही आचार्य संघ के आगमन का संकेत मिला, हमने अपना वाहन एक ओर खड़ा किया, नीचे उतरकर बापूजी को आदरपूर्वक व्हीलचेयर पर बैठाया।
आचार्य संघ उस समय शौच क्रिया हेतु गया हुआ था। हम श्रद्धा भाव से धूप में एक ओर खड़े प्रतीक्षा करते रहे। कुछ समय पश्चात आचार्य श्री समय सागर जी महाराज पाटे पर विराजमान हुए। हम बापूजी को लेकर उनके समीप पहुँचे और विनम्रतापूर्वक परिचय दिया कि ये आचार्य श्री पदमनंदी जी महाराज के पिता श्री हैं।
आचार्य श्री ने बड़े ध्यान और करुणा भाव से हमारी बात सुनी। उन्होंने बापूजी की ओर देखकर सहज भाव से कहा—

“इस उम्र में भी शरीर में कोई छल्ला नहीं है।”
अर्थात इतनी अधिक आयु में भी वे रोगमुक्त हैं।
उसी समय एक मुनि श्री ने मुस्कुराते हुए कहा—
“यह पुराने घी का असर है।”
संवाद मात्र दो मिनट का रहा, परंतु उन दो मिनटों में जो आत्मिक सुख, श्रद्धा और संतोष प्राप्त हुआ, वह जीवन भर की कमाई बन गया। बापूजी के कारण ही हमें आचार्य श्री से साक्षात् संवाद और उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
इसके पश्चात आचार्य श्री अग्रवाल पैलेस में विराजे। वहाँ भी हम बापूजी को व्हीलचेयर पर लेकर सबसे आगे खड़े हो गए। आचार्य श्री की पूजा संपन्न हुई। पूरे वातावरण में भक्ति, शांति और श्रद्धा का अद्भुत समन्वय था। सामने खड़े होने का सौभाग्य भी हमें केवल बापूजी की उपस्थिति के कारण ही मिला।
तत्पश्चात जब आचार्य श्री एवं संघ आहार-चर्या हेतु प्रस्थान करने लगे, उस खुले प्रांगण में भी हम बापूजी के साथ खड़े रहे। वहाँ गुरु-भक्ति, पड़गाहन और समाज की श्रद्धा का अनुपम दृश्य देखने को मिला। हम तो केवल बापूजी को व्हीलचेयर पर लेकर चल रहे थे, पर समाज स्वयं आगे बढ़कर सहयोग कर रहा था। लोग स्वतः कह रहे थे—
“आप आगे आइए।”

इस पूरे प्रसंग का सार अत्यंत स्पष्ट है—
यदि आपके घर में बुजुर्ग माता-पिता हैं, तो उन्हें बोझ न समझें, बल्कि उन्हें अपने जीवन की सबसे बड़ी पूँजी मानें। उन्हें उन स्थानों पर अवश्य ले जाएँ जहाँ वे जाना चाहते हैं। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि समाज किस प्रकार सम्मान देता है। बुजुर्गों की उपस्थिति न केवल आपके संस्कारों को उजागर करती है, बल्कि आपका मान-सम्मान भी स्वतः बढ़ जाता है।
यह अनुभव केवल आज का नहीं है। जब-जब छिंदवाड़ा में आचार्य संघ का आगमन हुआ है, बापूजी के साथ रहने पर हमें यही अनुभूति हुई है। उनके कारण हमें हर बार विशेष स्नेह, समाज का सहयोग और आचार्य श्री का आशीर्वाद प्राप्त होता रहा है।
निःसंदेह, बापूजी हमारे लिए केवल पिता नहीं हैं—
वे हमारी पहचान हैं, हमारी संस्कृति हैं और ईश्वर का सजीव आशीर्वाद हैं

