नववधु की अटल प्रतिज्ञा को पूर्ण कराने वाले परिवार में जन्मा युगपुरुष

सन 1870 की घटना है
उत्तरप्रदेश के एटा जिले के कोसमा ग्राम से तीन किमी दूर तखावन नामक नाम का गाँव है।जहा एक जैन श्रेष्ठी ठाकुरदास जी दिवाकर जी रहते थे।जब वे मात्र 19 वर्ष के थे तब उनकी शादी 15 वर्षीय श्रीमती शीला जी से की गई।ब्याह कर ससुराल(तखावन)आई तो चकित रह गई कि गाँव और घर तो सुंदर है,पर बस्ती में जिनमंदिर नही है।
जब घर की सयानी महिलाओ ने उनसे भोजन लेने दुलार भरा अनुरोध किया तो शीला जी मौन बैठी रही।सास द्वारा पूछने पर बतलाया कि बिना जिनदर्शन किये भोजन नही लेती।
सारे परिवार में हलचल मच गई।सभी के मुँह पर एक ही प्रश्न अब क्या होगा?नई-नवेली वधु के लिए मन्दिर कहा से लाये।
प्रथम दिन निराहार बीत गया।दूसरे दिन ससुर जी ने दहलान में खड़े होकर बहु को समझाया-बेटी शीला रानी,मन्दिर नही है तो धीरे-धीरे वह भी हो जावेगा,अभी भगवान पार्श्वनाथ की तस्वीर के दर्शन करो।उसी के समक्ष भावपूजा कर लो ताकि तुम्हारी ननदे तुम्हे भोजन करा सके।
शीला जी घर के सर्वाधिक वरिष्ठ व महत्वपूर्ण सदस्य ससुरजी की विन्ययुक्त वाणी सुन रही थी,वे अनुभव कर रही थी कि उनके निराहार रहे जाने से सारे घर-परिवार को हार्दिक पीड़ा होगी पर बेचारी,धर्म की धारी, मजबूरी थी,अतः हाथ जोड़कर ससुरजी से बोली-हे पूज्यवर,आप मेरे पिता है, आपकी अंतर्पीडा और बेचैनी समझ रही हूँ किन्तु मेरी प्रार्थना पर ध्यान दीजिए मुझे कुछ दिनों तक उपवास पर रहने दीजिए,बाद में अवश्य कोई उचित निर्णय लूँगी जो आप सभी को प्रियत्तर लगेगा।
बहु के विवेकपूर्ण उत्तर को सुनकर ससुर जी मौन रह गये।तब सासू जी ने प्यार से कहा- बेटी तू उपवास करेगी तो हम लोग क्यो आहार लेंगे,हम भी उपवास करेंगे।
बहु ने सकुचाते हुए कहा-नही माताजी,आप ऐसा न करे,अन्यथा मेरी आत्मशक्ति कम हो पड़ेगी।
मनुहारे करते हुए दूसरा दिन भी बिदा ले गया।कहते है-‘जहाँ चाह है,वहा राह है।’तीसरे दिन जैन तो जैन गाँव के ठाकुरो व अजैनो तक चर्चा जा पहुँची कि सेठ साब की पुत्र वधु तीन दिन से उपवास पर है।
गाँव की अन्यान्य बहुएँ और अन्य अन्य माताएँ,बहिने भी शीला जी को देखने उनसे दो शब्द बोलने ,सेठ जी के घर जा पहुची।पर उन्हें बाहर से ही लौटना पड़ा,शीला जी सामायिक करने भीतर वाली कोठरी में विराजित थी।
तब तक एक गाड़ी वाला सेठ जी के घर के सामने आता दिखा, वह आवाज लगा रहा था-ले लो प्रतिमा जी ले लो।आवाज सुनकर सभी के कान खड़े हो गए।समझते हुए देर नही लगी कि गाड़ीवाला प्रतिमा बेचने निकला है।
सेठ जी ने गाड़ी घर के समक्ष रुकवाली,पूछा ‘भाई’काहे की प्रतिमा है?
जी,तीर्थंकर पार्श्वनाथ की।
पाषाण निर्मित?
जी ,पाषाण निर्मित ।
बतलाना,भला।
तब तक गाड़ी के चारो तरफ भीड़ लग गई।गाड़ीवाले ने प्रतिमा के ऊपर ढाके गये शुभ वस्त्र के आवरण को हटाया,तो लगा कि सेठ जी के समक्ष अभी-अभी कोई विशाल ‘मूर्ति अनावरण समारोह’सम्पन्न हो गया है।प्रतिमा जी की कालसज्जा को देख वे चकित हो गये।तब तक अन्तर्गृह से उनकी श्रीमती जी,पुत्रिया,बहिने,बेटिया,बुआए, मामीया,चाचियां आदि अनेकानेक महिलाए बाहर निकल,सभी गाड़ी के पास आ गई।और प्रतिमा जी को निहारती रह गई।
शादी वाले घर के समक्ष भीड़ देखकर पूरा पड़ोस भी आ गया सभी गाड़ी की ओर देखने लगे।सेठ जी के अधरों से पार्श्व भक्ति की स्तुति निकल पड़ी।
अचानक उन्हें ध्यान हो आया कि वे गाड़ीवान के समक्ष खड़े है,मन्दिर जी मे नही।अतः मन को नियंत्रित कर पूछ बैठे-‘भाई जी !क्या न्यौछावर लीजियेगा इसकी?
जी,ग्यारह रुपये नगदी।
ग्यारह शब्द सुनकर भीड़ में खड़े लोगो की भौहे खिंच गई, जैसे मन ही मन कह रहे हो’इतनी महंगी’?
सत्य है,उस शताब्दी में सम्भवतः सन 1870 में,ग्यारह रुपये?आज के पच्चीस हजार तुल्य अवश्य रहे होंगे।किन्तु सेठ अपनी बेटी तुल्य पुत्र वधु के लिए वह राशि तुरन्त न्यौछावर कर देना चाहते थे,उन्होंने श्रीमती जी को संकेत कर दिया।वे तुरन्त गृह में जाकर राशि लेकर आ गई।
दिवाकर जी ने उपस्थित समस्त समुह के समक्ष गाड़ीवान के माथे पर मंगल तिलक लगाया,उसका अभिनन्दन किया और राशि उसके हाथो में सौप कर बोले-बन्धु आपने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है,शायद आप नही जानते हो।इसप्रकार वह प्रतिमा जी उन्हें सानन्द सौपकर स्वगृह लौट गया।
ठाकुरदास जी ने घर के एक साफ कक्ष में काष्ठ का तख्त रखा,तख्त पर उल्टा कोपर रख ,सिहासन की भूमि तैयार की।ऊपर चंदोवा बांध दिया।स्नान कर पूजा के नये/कोरे वस्त्र पहिने और पिताश्री के साथ मिलकर लघुपंचकल्याँणक कर डाला।
प्रतिमा जी की प्रतिष्ठोपरान्त घर मे आनन्द छा गया।लाडली बहु शीला ने आहार प्राप्त किया।परिवार में धर्मानन्द का माहौल बन गया।सभी लोग हँसी-खुशी से अपने-अपने दायित्वों के निर्वहन में जुट गये।ठाकुरदास जी मन ही मन बुदबुदाये -हे तीर्थंकर पार्श्वनाथ भगवान ,आज प्रत्यक्ष में समझ गया कि आपको भक्तजन ‘विघ्नहर’ क्यो कहते है?
शीलाजी की धार्मिक कट्टरता उस परिवार में समा गई।पूज्य हो गई।ऐसे महान दम्पत्ति के बेटे बिहारीलाल और बहू कटोरी देवी के नेमि नामक अतिभव्य पुत्र का जन्म हुआ जो आगे चलकर जैन जगत के महान सन्त वात्सल्यरत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी के रूप में जग विख्यात हुए
जय श्री विमलगरु, जय श्री सन्मतिगुरु,जय श्री भरत गुरु,जय श्री कनकगुरु,जय श्री विराग गुरु, जय श्री सुनिलगुरु

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