इतिहास के पन्नों में आचार्य पद🛑
भाग-1
आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूल पट्ट परंपरा में आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज तृतीय पट्टाचार्य थे। उनकी समाधि और उसके बाद जैन समाज में उपजी परिस्थितियाँ तथा एक साथ दो आचार्यों (मूल आचार्य और एक अन्य मुनि आचार्य) के अस्तित्व में आने की घटना जैन इतिहास का एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण अध्याय है।
इस पूरी घटना का विशाल और विस्तृत क्रमानुसार विवरण नीचे दिया गया है।

🛑 समाधि के समय की परिस्थितियां और अकस्मात घटना
सन 1969 की शुरुआत में, आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज अपने विशाल मुनि संघ के साथ श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, महावीरजी (राजस्थान) में विराजमान थे।
- अचानक अस्वस्थता: फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष के अंत में आचार्य श्री को अचानक अल्पकालिक तीव्र ज्वर (तेज बुखार) आया।
- अकस्मात समाधि: बुखार इतना तीव्र था कि संतों और समाज को संभलने का अवसर ही नहीं मिला और 16 फरवरी 1969 (फाल्गुन कृष्ण अमावस्या) के दिन महावीरजी क्षेत्र में ही गुरुदेव की अचानक समाधि (देहत्याग) हो गया।
- उत्तराधिकारी का संकट: चूंकि समाधि अत्यंत आकस्मिक थी, इसलिए आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज अपने जीवनकाल में संघ के अगले पट्टाचार्य (उत्तराधिकारी) का नाम लिखित या मौखिक रूप से घोषित नहीं कर पाए थे। इसके कारण पूरे जैन समाज और मुनि संघ के सामने एक बड़ा नेतृत्व संकट खड़ा हो गया कि अब मूल गद्दी का उत्तराधिकारी किसे बनाया जाए।

🛑”मूल पट्टाचार्य” कौन बने? (आचार्य श्री धर्मसागर जी)
आचार्य शिवसागर जी की समाधि के तुरंत बाद महावीरजी क्षेत्र में ही संपूर्ण जैन समाज, प्रबुद्ध श्रावकों और मुनि संघ की एक अति महत्वपूर्ण सभा हुई।
🛑दीक्षा ज्येष्ठता का नियम: जैन श्रमण संस्कृति के नियमानुसार, गुरु की अनुपस्थिति में संघ का नेतृत्व ‘दीक्षा पर्याय’ (मुनि दीक्षा के वर्षों) के आधार पर तय किया जाता है।
🛑 महावीरजी में पट्टाभिषेक: संघ में उस समय सबसे सीनियर (दीक्षा ज्येष्ठ) मुनि, मुनि श्री धर्मसागर जी महाराज थे (जिन्होंने सन 1951 में ही आचार्य वीरसागर जी से मुनि दीक्षा ले ली थी)।
🛑निर्णय: सर्वसम्मति से मुनि धर्मसागर जी को आचार्य शांतिसागर परंपरा की मूल गद्दी का चतुर्थ पट्टाचार्य (मूल आचार्य) घोषित किया गया। उनकी पदस्थापना आचार्य शिवसागर जी की समाधि के कुछ ही दिन बाद 25 फरवरी 1969 (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) को महावीरजी क्षेत्र में ही बड़े पैमाने पर संपन्न हुई।

🛑 “दूसरे मुनि” आचार्य कैसे बने? (आचार्य श्री ज्ञानसागर जी)
अब इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू नसीराबाद (अजमेर) में घट रहा था, जहाँ मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज अकेले या छोटे संघ के साथ साधना कर रहे थे।
- विद्वत्ता और आयु में वरिष्ठ: मुनि ज्ञानसागर जी (पूर्व नाम: पंडित भूरामल छाबड़ा) दीक्षा में तो मुनि धर्मसागर जी से छोटे थे, परंतु उम्र (जन्म 1897) और शास्त्रों के ज्ञान (प्रकांड मनीषी व महाकवि) में वे संघ में सबसे बड़े और सर्वश्रेष्ठ थे।
🛑नसीराबाद समाज का निर्णय: चूंकि ज्ञानसागर जी के दीक्षा गुरु भी आचार्य शिवसागर जी ही थे, इसलिए नसीराबाद क्षेत्रीय समाज ने ज्ञानसागर जी की महान विद्वत्ता को देखते हुए आचार्य शिवसागर जी की समाधि से 9 दिन पहले ही ज्ञान सागर जी को आचार्य पद प्रदान कर दिया।
🛑 गुरु के चित्र के समक्ष पट्टाभिषेक: मुनि धर्मसागर जी के महावीरजी में आचार्य बनने से भी पहले, यानी 7 फरवरी 1969 को ही नसीराबाद की समाज ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने आचार्य शिवसागर जी के चित्र (आभामंडल) को साक्षी मानकर उनके समक्ष मुनि ज्ञानसागर जी को शास्त्र भेंट किए और उन्हें आचार्य पद प्रदान किया।

इस घटनाक्रम का ऐतिहासिक सारांश
इस प्रकार आचार्य शिवसागर जी की समाधि के बाद जैन समाज को एक साथ दो महान आचार्य मिले:
🛑. आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज (मूल पट्टाचार्य): ये आचार्य शांतिसागर-वीरसागर-शिवसागर की मूल संघ गद्दी के चौथे अधिकृत आचार्य बने, क्योंकि ये दीक्षा में सबसे वरिष्ठ (सीनियर) थे।
🛑 आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज (स्वतंत्र पट्ट): ये उम्र और ज्ञान में सबसे वरिष्ठ होने के कारण नसीराबाद समाज द्वारा गुरु के चित्र के समक्ष आचार्य बनाए गए। इन्होंने एक स्वतंत्र पट्ट चलाया, जिसके अंतर्गत इन्होंने आगे चलकर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को मुनि दीक्षा और फिर अपना आचार्य पद सौंपा था।
इन दोनों आचार्यों ने अलग-अलग संघ का संचालन किया, लेकिन आपस में कभी कोई मनमुटाव नहीं रखा और पूरी दिगंबर जैन चर्या को आगे बढ़ाया।
✍️ पं. मयंक शास्त्री टीकमगढ़


